वट सावित्री व्रत 2026 (Vat Savitri Vrat 2026): पूजा विधि, सामग्री और महत्व की पूरी जानकारी
Apr 24, 2026
वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी व्रत है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और घर में सुख-समृद्धि की कामना से रखती हैं। यह व्रत सती सावित्री की अटूट भक्ति, असीम प्रेम और अदम्य साहस का प्रतीक है, जिन्होंने यमराज (Yamraj) से अपने पति सत्यवान (Satyawan) के प्राण वापस छीन लिए थे।
ज्येष्ठ माह की अमावस्या को उत्तर भारत में और ज्येष्ठ पूर्णिमा को महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष (Vat Vriksha), यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं क्योंकि पुराणों के अनुसार इस वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है।
इस ब्लॉग में आप जानेंगे कि वट सावित्री व्रत 2026 कब है (Vat Savitri Vrat Kab Hai 2026), शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा विधि, सामग्री लिस्ट, व्रत कथा और व्रत का आध्यात्मिक महत्व। साथ ही यह भी बताएंगे कि घर पर वट सावित्री व्रत कैसे करें।
वट सावित्री व्रत 2026 कब है? (Vat Savitri Vrat Kab Hai 2026?)
वट सावित्री व्रत (अमावस्या) 2026 उत्तर भारत में शनिवार, 16 मई 2026 को मनाया जाएगा। यह व्रत पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में ज्येष्ठ माह की अमावस्या को रखा जाता है।
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में वट सावित्री पूर्णिमा व्रत (Vat Savitri Purnima Vrat) ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को सोमवार, 29 जून 2026 को मनाया जाएगा।
2026 वट सावित्री अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त
विवरण |
समय |
व्रत तिथि |
शनिवार, 16 मई 2026 |
अमावस्या तिथि प्रारम्भ |
16 मई 2026, प्रातः 05:11 बजे |
अमावस्या तिथि समाप्त |
17 मई 2026, रात्रि 01:30 बजे |
पूजा का शुभ मुहूर्त |
प्रातः 07:12 बजे से 08:24 बजे तक |
उदयातिथि के अनुसार यह व्रत 16 मई 2026, शनिवार को ही रखा जाएगा। शनिवार का दिन इस व्रत के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
2026 वट सावित्री पूर्णिमा की तिथि (महाराष्ट्र, गुजरात)
विवरण |
समय |
व्रत तिथि |
सोमवार, 29 जून 2026 |
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ |
28 जून 2026, प्रातः 08:35 बजे |
पूर्णिमा तिथि समाप्त |
29 जून 2026, प्रातः 06:48 बजे |
वट सावित्री व्रत क्यों मनाया जाता है? (Vat Savitri Vrat Kyun Manaya Jata Hai?)
वट सावित्री व्रत की जड़ें भारतीय पौराणिक कथाओं में बहुत गहरी हैं। इस व्रत की कथा स्कंद पुराण (Skanda Purana), भविष्योत्तर पुराण (Bhavishyottara Purana) और महाभारत (Mahabharata) में मिलती है। इस व्रत को रखने के पीछे कई कारण हैं:
पति की दीर्घायु: यह व्रत सबसे पहले पति की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की कामना से रखा जाता है।
अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: पुराणों के अनुसार, जो स्त्रियां इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
संतान सुख: अग्नि पुराण में वट वृक्ष को उत्सर्जन और सृजन का प्रतीक बताया गया है। इसीलिए यह व्रत संतान सुख की कामना से भी रखा जाता है।
पारिवारिक समृद्धि: सावित्री ने न केवल अपने पति के प्राण वापस पाए, बल्कि अपने श्वसुर का राज्य और आंखों की रोशनी भी यमराज से वापस मांगी। इसलिए यह व्रत पूरे कुल की समृद्धि का भी प्रतीक है।
वट वृक्ष पूजा का महत्व (Vat Vriksha Puja Ka Mahatva): पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और डालियों में भगवान शिव का वास होता है। ऐसे में इस वृक्ष की पूजा करने से तीनों देवताओं का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है। वट वृक्ष अपनी विशाल और फैलती शाखाओं के कारण अमरता और दीर्घायु का प्रतीक भी माना जाता है।
वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha)
वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha) का सार इस प्रकार है:
मद्र देश (Madra Desh) में अश्वपति (Ashwapati) नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अठारह वर्षों तक माँ सावित्री देवी की तपस्या और पूजा की, प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं। माँ सावित्री ने प्रसन्न होकर उन्हें एक तेजस्वी पुत्री का वरदान दिया। माँ सावित्री की कृपा से जन्मी होने के कारण कन्या का नाम सावित्री ही रखा गया।
समय बीता और सावित्री विवाह योग्य हुई। राजा अश्वपति ने उसे स्वयं अपना वर चुनने की स्वतंत्रता दी। सावित्री भ्रमण करते हुए शाल्व देश के वन पहुंची, जहां नेत्रहीन और राज्यहीन राजा द्युमत्सेन (Dyumatsena) अपने पुत्र सत्यवान (Satyawan) के साथ वनवास काट रहे थे। सत्यवान के सद्गुण, सुंदरता और श्रेष्ठ चरित्र को देखकर सावित्री ने उन्हें अपना पति चुन लिया।
ऋषि नारद मुनि (Narada Muni) ने बताया कि सत्यवान बेहद गुणवान हैं, परंतु उनकी आयु केवल एक वर्ष बची है। सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और उनसे विवाह कर ससुराल में रहने लगीं।
जब सत्यवान की मृत्यु का दिन निकट आया, तो सावित्री ने तीन दिन पूर्व से ही निर्जला व्रत शुरू कर दिया। निश्चित दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए और सावित्री भी उनके साथ हो लीं। अचानक सत्यवान का सिर भारी हो गया और वे एक वट वृक्ष की छाया में लेट गए। तभी यमराज (Yamraj) आए और सत्यवान की आत्मा को अपने पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर ले चले।
सावित्री भी यमराज के पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें रोका, परंतु सावित्री की भक्ति और ज्ञान से प्रसन्न होकर उन्होंने बारी-बारी से चार वर दिए। सावित्री ने अपने ससुर की आंखें और राज्य वापस मांगा, अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा और अंत में ऐसा वरदान मांगा जिससे उनकी सौ संतानें हों, परंतु यह संभव केवल तभी होगा जब सत्यवान जीवित रहें। यमराज धर्म के बंधन में फंस गए और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
सत्यवान उसी वट वृक्ष के नीचे जीवित हो उठे और दोनों ने घर लौटकर देखा कि ससुर की आंखें वापस आ गई हैं और उनका छिना हुआ राज्य भी मिल गया है। तभी से वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने और पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।
वट सावित्री व्रत का महत्व (Vat Savitri Vrat Ka Mahatva)
इस व्रत का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व, समर्पण, प्रेम और धैर्य की जीवंत मिसाल बन चुका है।
धार्मिक महत्व: स्कंद पुराण और भविष्योत्तर पुराण में इस व्रत का विशद वर्णन मिलता है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने वाली महिला के जीवन में आने वाले सभी कष्ट दूर होते हैं और वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है।
पर्यावरण का संदेश: वट वृक्ष, यानी बरगद का पेड़ सबसे अधिक ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों में से एक है। इस व्रत के माध्यम से भारतीय संस्कृति ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया है।
आध्यात्मिक महत्व: वट वृक्ष की जटाएं सावित्री देवी का रूप मानी जाती हैं। इसकी पूजा से मन में भक्ति, दृढ़ता और सकारात्मकता का संचार होता है।
वट सावित्री व्रत सामग्री लिस्ट हिंदी (Vat Savitri Vrat Samagri List Hindi)
वट सावित्री व्रत सामग्री (Vat Savitri Vrat Samagri) की सूची नीचे दी गई है। पूजा से एक दिन पहले ही इन्हें इकट्ठा कर लें:
मुख्य सामग्री:
सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या चित्र
बरगद (वट वृक्ष) की डाली या फल
बांस की टोकरी और बांस का पंखा
लाल कलावा (Kalawa) या कच्चा सफेद सूत
जल से भरा कलश (Kalash)
पूजन सामग्री:
रोली, हल्दी, कुमकुम और अक्षत (चावल)
सिंदूर
लाल और पीले फूल
पान के पत्ते और सुपारी
नारियल
फल (विशेषकर आम, खरबूजा)
भीगा हुआ काला चना
मिठाई, बताशा और पूड़ियां
दीप और सुगंध सामग्री:
मिट्टी का दीया और घी या तेल
धूप बत्ती (Dhoop Batti) और अगरबत्ती (Agarbatti)
कपूर
श्रृंगार सामग्री:
सोलह श्रृंगार का सामान (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, महावर आदि)
सवा मीटर का लाल कपड़ा
अन्य सामग्री:
वट सावित्री व्रत कथा पुस्तक
पूजा की थाली
चौकी और लाल कपड़ा (आसन के लिए)
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पूजा के लिए अगरबत्ती और धूप बत्ती का महत्व (Puja Ke Liye Agarbatti Aur Dhoop Batti)
पूजा में अगरबत्ती (Agarbatti) और धूप बत्ती (Dhoop Batti) का विशेष स्थान है। इनसे निकलने वाला सुगंधित धुआं वातावरण को पवित्र करता है और मन को एकाग्र करने में सहायता करता है।
पूजा के लिए अगरबत्ती कौन सी अच्छी है (Puja Ke Liye Agarbatti Kaun Si Achi Hai): वट सावित्री पूजा में चंदन (Chandan), गुलाब (Gulab), केवड़ा (Kewda) या लोबान (Lobaan) की सुगंध वाली अगरबत्ती का उपयोग शुभ माना जाता है। इन्हें पूजा स्थल पर जलाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
धूप बत्ती (Dhoop Batti): धूप बत्ती का उपयोग विशेष रूप से पूजा और हवन के दौरान किया जाता है। यह वातावरण को शुद्ध करती है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है। गाय के गोबर से बनी धूप बत्ती को सर्वाधिक शुद्ध और लाभकारी माना जाता है।
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वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi)
वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi) को ध्यानपूर्वक और श्रद्धापूर्वक पूरा करें। नीचे चरण-दर-चरण विधि दी गई है:
चरण 1: प्रातःकाल की तैयारी
व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सोलह श्रृंगार करें और माथे पर सिंदूर लगाएं। व्रत का संकल्प लें और घर के पूजास्थल पर दीप प्रज्वलित करें।
चरण 2: पूजा सामग्री तैयार करें
बांस की टोकरी में सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या चित्र, सभी पूजन सामग्री, फल, फूल, धूप बत्ती, अगरबत्ती और जल से भरा कलश रखें।
चरण 3: वट वृक्ष पर जाएं
पूजा सामग्री लेकर पास के बरगद के पेड़ के पास जाएं। वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान की मूर्ति स्थापित करें।
चरण 4: पूजा करें
वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान की मूर्ति पर जल अर्पित करें। रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत और फूल चढ़ाएं। धूप बत्ती और अगरबत्ती जलाएं। दीपक प्रज्वलित करें। फल, भीगे चने, पूड़ी और मिठाई का भोग लगाएं।
चरण 5: परिक्रमा और धागा बांधें
लाल कलावा या कच्चे सफेद सूत को वट वृक्ष के चारों ओर 7 बार या 108 बार परिक्रमा करते हुए लपेटें। यह धागा सुरक्षा और दीर्घायु के बंधन का प्रतीक है।
चरण 6: व्रत कथा सुनें
पंडित जी या घर की किसी बुजुर्ग महिला से वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha) सुनें। कथा सुनने के बाद सावित्री और सत्यवान की आरती करें।
चरण 7: व्रत खोलना
पूजा पूरी होने के बाद अपने पति, सास-ससुर और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें। भीगे हुए काले चने और जल से व्रत खोलें। शाम को चाँद निकलने के बाद पूर्ण भोजन ग्रहण करें।
घर पर वट सावित्री व्रत कैसे करें (Ghar Par Vat Savitri Vrat Kaise Karein)
यदि आपके घर के पास बरगद का पेड़ नहीं है, तो घर पर भी यह पूजा की जा सकती है। इसके लिए निम्न उपाय अपनाएं:
बरगद की शाखा: बाजार से बरगद की एक ताजी शाखा लाकर उसे गमले में या मिट्टी में लगा दें और उसी की पूजा करें।
चित्र का उपयोग: यदि शाखा उपलब्ध न हो, तो वट वृक्ष का चित्र किसी पत्रिका या कैलेंडर से काटकर पूजा स्थान पर रख सकती हैं।
पूजा विधि वही रहती है: घर पर पूजा करते समय सभी नियम, सामग्री और विधि वही रहती है जो बरगद के पेड़ के पास की जाती है। बस परिक्रमा के स्थान पर उस शाखा या चित्र के चारों ओर कलावा लपेटें।
पर्यावरण संरक्षण: यदि संभव हो, तो इस दिन एक बरगद का पौधा जरूर लगाएं। मान्यता है कि बरगद का पौधा लगाने से पारिवारिक और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।
वट वृक्ष पूजा का महत्व (Vat Vriksha Puja Ka Mahatva)
पाराशर मुनि (Parashar Muni) ने कहा है: "वट मूले तोपवासा" अर्थात वट वृक्ष की जड़ में उपवास करने से अनेक पुण्य प्राप्त होते हैं। दार्शनिक दृष्टि से वट वृक्ष दीर्घायु, अमरत्व और ज्ञान का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को भी इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। बरगद का पेड़ सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है, इसीलिए इसे पति की दीर्घायु का प्रतीक माना गया है।
पूजा सामग्री ऑनलाइन कहाँ से खरीदें (Puja Samagri Online Kahan Se Khareedein)
आज के व्यस्त जीवन में हर चीज बाजार से ढूंढना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में पूजा सामग्री ऑनलाइन (Puja Samagri Online) मंगवाना सबसे सुविधाजनक विकल्प है।
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वट सावित्री व्रत के नियम और सावधानियां
व्रत के दिन निर्जला या फलाहारी रहें। जो महिलाएं स्वास्थ्य कारणों से निर्जला नहीं रह सकतीं, वे फलाहार ले सकती हैं।
पूजा में काले रंग के वस्त्र न पहनें। लाल, पीला या हरा रंग शुभ माना जाता है।
पूजा के समय मन में पति के दीर्घायु और परिवार की समृद्धि की कामना करें।
बरगद के पत्ते या शाखा को तोड़ते समय क्षमा प्रार्थना करें।
व्रत खोलते समय सबसे पहले पति का आशीर्वाद लें।
यदि किसी कारण व्रत न रख सकें, तो पूजा अवश्य करें।
वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) केवल एक उपवास नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का महापर्व है। यह व्रत हर उस महिला के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना रखती है।
2026 में यह पावन व्रत शनिवार, 16 मई 2026 को पड़ रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 07:12 से 08:24 बजे तक रहेगा। सभी पूजन सामग्री पहले से तैयार कर लें और पूरी श्रद्धा के साथ यह व्रत करें।
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सभी सुहागिनों को वट सावित्री व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं।
FAQs
1. वट सावित्री व्रत 2026 में कब है?
उत्तर: उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत 2026 (Vat Savitri Vrat 2026) शनिवार, 16 मई 2026 को मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि 16 मई को प्रातः 05:11 बजे से शुरू होकर 17 मई को रात्रि 01:30 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 16 मई को ही रखा जाएगा। महाराष्ट्र और गुजरात में वट पूर्णिमा व्रत 29 जून 2026, सोमवार को होगा।
2. क्या कुंवारी लड़कियां वट सावित्री व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए है। हालांकि कुछ परंपराओं में कुंवारी लड़कियां भी अच्छे वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से यह व्रत रख सकती हैं। स्थानीय परंपरा और पंडित की सलाह के अनुसार निर्णय लें।
3. यदि घर के पास बरगद का पेड़ न हो तो वट सावित्री पूजा कैसे करें?
उत्तर: यदि पास में बरगद का पेड़ नहीं है, तो बाजार से बरगद की एक ताजी डाली लाकर उसे गमले में लगाएं और उसी की पूजा करें। एक विकल्प यह भी है कि वट वृक्ष का चित्र पूजास्थल पर रखकर पूजा करें। सभी पूजा विधि और सामग्री वही रहती है। पूजा के बाद यदि संभव हो, तो घर के पास या मंदिर में एक बरगद का पौधा जरूर लगाएं।
4. वट सावित्री व्रत में किस रंग की अगरबत्ती जलाएं?
उत्तर: वट सावित्री पूजा में चंदन, गुलाब, केवड़ा या लोबान की सुगंध वाली अगरबत्ती जलाना शुभ माना जाता है। ये सुगंध वातावरण को पवित्र करती हैं और मन को एकाग्र रखती हैं। हमेशा शुद्ध और प्राकृतिक सामग्री से बनी अगरबत्ती का उपयोग करें। Dhoop Chaon & Co. पर 100% प्राकृतिक अगरबत्ती उपलब्ध है।
5. वट सावित्री व्रत और करवा चौथ में क्या अंतर है?
उत्तर: दोनों ही व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं, परंतु इनमें कुछ अंतर है। करवा चौथ (Karva Chauth) कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है और इसमें चंद्रमा की पूजा होती है। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) ज्येष्ठ माह में मनाया जाता है और इसमें वट वृक्ष की पूजा होती है। इसके अलावा, वट सावित्री व्रत की जड़ें महाभारत काल की सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ी हैं।