पोंगल पूजा सामग्री और पोंगल त्योहार का महत्व
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पोंगल त्योहार का महत्व और पूजा सामग्री की पूरी सूची

Jan 07, 2026

पोंगल (Pongal) दक्षिण भारत का सबसे प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह त्योहार विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हर साल जनवरी माह में आने वाला यह पर्व नई फसल के आगमन की खुशी और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।

पोंगल त्योहार क्या है? (Pongal Festival)

पोंगल (Pongal festival) शब्द का तमिल भाषा में अर्थ होता है "उबालना" या "उफान"। यह चार दिवसीय पर्व मकर संक्रांति के समय मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं। यह किसानों का त्योहार है जो समृद्धि, खुशहाली और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।

इस पर्व का इतिहास लगभग 1000 साल से भी पुराना है। पोंगल का त्योहार न केवल तमिलनाडु में बल्कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और विदेशों में रहने वाले तमिल लोगों द्वारा भी उत्साह के साथ मनाया जाता है।

पोंगल त्योहार का महत्व (Pongal Celebration)

पोंगल त्योहार (Pongal celebration) तमिल संस्कृति और कृषि परंपराओं का प्रतीक है। यह पर्व प्रकृति, किसानों और मवेशियों को समर्पित है। इस त्योहार में इंद्र देव, सूर्य देव और खेतिहर पशुओं की पूजा की जाती है।

पोंगल के महत्व के मुख्य कारण:

1. कृषि उत्सव: यह फसल कटाई का उत्सव है जो किसानों की मेहनत का सम्मान करता है।

2. सूर्य पूजा: सूर्य देव को अन्न और धन का दाता माना जाता है, इसलिए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

3. नववर्ष का प्रारंभ: तमिल कैलेंडर के अनुसार पोंगल से नए साल की शुरुआत होती है।

4. पारिवारिक एकता: यह त्योहार परिवार और समुदाय को एक साथ लाता है।

5. प्रकृति का आभार: वर्षा, धूप और पृथ्वी की उर्वरता के लिए प्रकृति का धन्यवाद किया जाता है।

पोंगल के चार दिन और उनका महत्व (Pongal Special)

पोंगल का त्योहार (Pongal special) चार दिनों तक चलता है और हर दिन का अपना विशेष महत्व होता है:

पहला दिन - भोगी पोंगल (14 जनवरी)

पोंगल का पहला दिन भोगी पोंगल के नाम से जाना जाता है। यह दिन देवराज इंद्र को समर्पित है। इस दिन वर्षा के लिए इंद्र देव का आभार प्रकट किया जाता है। लोग अपने घरों से पुराने सामान, कूड़े-करकट और बेकार की चीजों को एकत्रित कर उन्हें जलाते हैं। यह परंपरा बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त कर नई शुरुआत का प्रतीक है।

दूसरा दिन - सूर्य पोंगल या थाई पोंगल (15 जनवरी)

यह दिन पोंगल का मुख्य दिन होता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें विशेष भोग अर्पित किया जाता है। नए चावल, गुड़, दूध और मूंग दाल से पोंगल नामक खीर तैयार की जाती है। जब यह खीर उबलकर बर्तन से बाहर निकलती है, तो सभी लोग "पोंगलो पोंगल" कहकर खुशी मनाते हैं।

तीसरा दिन - मट्टू पोंगल (16 जनवरी)

तीसरे दिन को मट्टू पोंगल कहा जाता है। यह दिन मवेशियों को समर्पित है। किसान अपने गाय-बैलों को स्नान कराते हैं, उनके सींगों में तेल लगाते हैं और उन्हें फूलों और घंटियों से सजाते हैं। इस दिन पशुओं की पूजा की जाती है और उन्हें विशेष भोजन खिलाया जाता है। यह दिन कृषि में पशुओं के महत्व को दर्शाता है।

चौथा दिन - कानुम पोंगल (17 जनवरी)

पोंगल का अंतिम दिन कानुम पोंगल या कन्या पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन घरों को फूलों और पत्तों से सजाया जाता है। आंगन और घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जाती है। लोग अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं, पिकनिक मनाते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। यह परिवार और समुदाय के साथ समय बिताने का दिन है।

पोंगल पूजा की सामग्री की पूरी सूची (Pongal Pooja)

पोंगल की पूजा (Pongal pooja) करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

अनाज और खाद्य सामग्री:

  1. नया चावल - 1 कप (नई फसल का चावल)

  2. मूंग दाल - आधा कप

  3. गुड़ - आवश्यकतानुसार

  4. दूध - 2-3 कप

  5. गन्ना - 2-3 टुकड़े (सूर्य देव को अर्पित करने के लिए)

  6. काजू और किशमिश - सजावट के लिए

  7. इलायची - स्वाद के लिए

  8. घी - पोंगल बनाने के लिए

पूजा सामग्री:

  1. नया मिट्टी का बर्तन - पोंगल बनाने के लिए

  2. केले के पत्ते - भोग परोसने के लिए

  3. आम के पत्ते - सजावट के लिए

  4. हल्दी की गांठ - 2 गांठ

  5. कुमकुम (सिंदूर)

  6. चावल (अक्षत) - पूजा के लिए

  7. सुपारी और पान के पत्ते

  8. नारियल - 1 पूरा

  9. फूल और फूलमाला - गुलाब, मैरीगोल्ड या अन्य ताजे फूल

  10. अगरबत्ती (धूप) - 5-10 अगरबत्ती

  11. कपूर - आरती के लिए

  12. घी का दीपक - तांबे या पीतल का दीपक

  13. माचिस या लाइटर - दीपक जलाने के लिए

  14. गंगाजल - पवित्रीकरण के लिए

  15. चंदन - तिलक लगाने के लिए

सजावट की सामग्री:

  1. रंगोली के रंग - घर के आंगन को सजाने के लिए

  2. तोरण - दरवाजे पर लगाने के लिए

  3. दूर्वा (दूब घास)

  4. फूलों की माला

अन्य आवश्यक सामग्री:

  1. तांबे या पीतल का कलश - जल भरने के लिए

  2. चौकी या पाट - पूजा स्थल के लिए

  3. लाल या पीला कपड़ा - चौकी पर बिछाने के लिए

  4. थाली - पूजा सामग्री रखने के लिए

  5. लोटा - जल रखने के लिए

  6. आरती थाली

  7. चम्मच - पोंगल बनाने के लिए

  8. प्रसाद के लिए फल - केला, सेब, संतरा आदि

घर पर पोंगल पूजा कैसे करें? (Pongal Pooja at Home)

घर पर पोंगल की पूजा (Pongal pooja at home) करना बहुत सरल है। आइए जानते हैं विस्तृत विधि:

तैयारी (Pongal Celebration at Home)

1. स्थान की तैयारी: घर के आंगन या खुले स्थान पर पूजा करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें।

2. रंगोली बनाना: पूजा स्थल के चारों ओर रंगोली बनाएं। पारंपरिक तमिल कोलम (रंगोली) बनाना शुभ होता है।

3. चौकी की स्थापना: एक छोटी चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।

पूजा विधि:

चरण 1: स्नान और स्वच्छता सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

चरण 2: पूजा स्थल का निर्माण चौकी पर कलश की स्थापना करें। कलश में जल, आम के पत्ते, हल्दी की गांठ, सुपारी और एक नारियल रखें।

चरण 3: सूर्य देव का ध्यान पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और सूर्य देव का ध्यान करें।

चरण 4: संकल्प अपने नाम, गोत्र और परिवार के सदस्यों के नाम के साथ संकल्प लें कि आप विधिपूर्वक पोंगल पूजा कर रहे हैं।

चरण 5: पोंगल तैयार करना नए मिट्टी के बर्तन में दूध उबालें। जब दूध उबलने लगे तो उसमें चावल, मूंग दाल और गुड़ डालें। जब पोंगल उबलकर बर्तन से बाहर निकले तो सभी मिलकर "पोंगलो पोंगल" बोलें।

चरण 6: सूर्य पूजन पोंगल तैयार होने के बाद उसे केले के पत्ते पर रखें। सूर्य देव को अर्घ्य दें, फूल, गन्ना, फल और पोंगल अर्पित करें।

चरण 7: आरती और मंत्र घी का दीपक जलाएं, अगरबत्ती लगाएं और सूर्य देव की आरती करें। निम्न मंत्र का जाप करें:

"ॐ सूर्याय नमः" "ॐ भास्कराय नमः" "आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।"

चरण 8: प्रसाद वितरण पूजा के बाद पोंगल का प्रसाद परिवार के सभी सदस्यों में बांटें।

पोंगल मनाने की परंपराएं

पोंगल उत्सव (Pongal celebration at home) की कुछ विशेष परंपराएं हैं:

1. घर की सफाई: पोंगल से पहले पूरे घर की सफाई की जाती है और पुरानी चीजों को फेंक दिया जाता है।

2. नए वस्त्र: पोंगल के दिन सभी नए कपड़े पहनते हैं।

3. जल्लीकट्टू: मट्टू पोंगल के दिन बैलों की दौड़ प्रतियोगिता आयोजित की जाती है।

4. रंगोली और सजावट: घर के मुख्य द्वार पर कोलम (रंगोली) बनाई जाती है।

5. पशुओं का सम्मान: मट्टू पोंगल पर गाय-बैलों को सजाया जाता है और उनकी विशेष पूजा की जाती है।

पोंगल की पौराणिक कथा

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने अपने बैल नंदी को पृथ्वी पर हर दिन तेल मालिश करने और महीने में एक बार भोजन करने का संदेश देने के लिए भेजा था। लेकिन नंदी ने गलती से यह घोषणा कर दी कि मनुष्यों को प्रतिदिन भोजन करना चाहिए और महीने में एक बार तेल मालिश करनी चाहिए।

इस गलती पर भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने नंदी को हमेशा के लिए पृथ्वी पर रहकर मनुष्यों की कृषि में मदद करने का श्राप दिया। इसी कारण मट्टू पोंगल पर बैलों की पूजा की जाती है और उनके योगदान का सम्मान किया जाता है।

पोंगल से जुड़ी मान्यताएं

  1. पोंगल के दिन सूर्य देव की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

  2. नए बर्तन में पोंगल बनाना शुभ माना जाता है।

  3. पोंगल का दूध उबलकर बाहर निकलना समृद्धि का संकेत है।

  4. इस दिन दान-पुण्य करना विशेष फलदायी होता है।

  5. पोंगल के दिन किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए।

पोंगल पकवान कैसे बनाएं?

सामग्री:

  • नया चावल - 1 कप

  • मूंग दाल - आधा कप

  • गुड़ - 1 कप (कद्दूकस किया हुआ)

  • दूध - 3 कप

  • घी - 4 बड़े चम्मच

  • काजू - 10-12

  • किशमिश - 2 बड़े चम्मच

  • इलायची पाउडर - आधा चम्मच

विधि:

  1. चावल और दाल को धोकर 20 मिनट भिगो दें।

  2. मिट्टी के बर्तन में दूध उबालें।

  3. उबलते दूध में चावल और दाल डालें।

  4. अच्छी तरह पकने दें।

  5. गुड़ मिलाएं और हिलाते रहें।

  6. घी में काजू और किशमिश भूनें।

  7. पोंगल में मिलाएं और इलायची पाउडर डालें।

  8. पोंगल तैयार है, सूर्य देव को अर्पित करें।

निष्कर्ष

पोंगल (Pongal festival) एक अद्भुत त्योहार है जो प्रकृति, कृषि और पारिवारिक मूल्यों का सुंदर समन्वय है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। घर पर पोंगल की पूजा (Pongal pooja at home) करना न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है बल्कि परिवार को एकजुट भी करता है।

इस वर्ष पोंगल पर अपने घर में इस पारंपरिक पूजा को करें और सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त करें। ऊपर दी गई पूजा सामग्री की सूची और विधि का पालन करके आप घर पर ही पूर्ण विधि-विधान से पोंगल का उत्सव (Pongal celebration) मना सकते हैं।

पोंगलो पोंगल! सभी को पोंगल की हार्दिक शुभकामनाएं!

FAQs

1. पोंगल त्योहार कब मनाया जाता है?

पोंगल त्योहार हर साल जनवरी माह में 14-17 तारीख के बीच मनाया जाता है। यह चार दिवसीय पर्व मकर संक्रांति के समय आता है जब सूर्य उत्तरायण होते हैं। 2025 में पोंगल 14 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। यह तमिल कैलेंडर के अनुसार थाई माह की पहली तारीख को शुरू होता है।

2. पोंगल पूजा के लिए सबसे जरूरी सामग्री क्या है?

पोंगल पूजा के लिए सबसे जरूरी सामग्री में नया चावल, गुड़, दूध, मूंग दाल, नया मिट्टी का बर्तन, गन्ना, फूल, केले के पत्ते, हल्दी, कुमकुम, दीपक, अगरबत्ती और नारियल शामिल हैं। इसके अलावा पूजा के लिए घी, कपूर, फल और रंगोली के रंग भी चाहिए। ये सभी सामग्री पोंगल की पारंपरिक पूजा के लिए आवश्यक हैं।

3. क्या हम घर पर पोंगल पूजा कर सकते हैं?

हां, बिल्कुल! पोंगल पूजा घर पर (Pongal celebration at home) करना बहुत ही शुभ और सरल है। आप अपने घर के आंगन, छत या किसी खुले स्थान पर इस पूजा को कर सकते हैं। पारंपरिक रूप से पोंगल की पूजा घर पर ही की जाती है जहां पूरा परिवार एक साथ मिलकर नए चावल से पोंगल बनाता है और सूर्य देव की पूजा करता है। घर पर पूजा करने से पारिवारिक एकता और भक्ति भावना दोनों बढ़ती है।

4. मट्टू पोंगल पर किसकी पूजा की जाती है?

मट्टू पोंगल पर गाय, बैल और अन्य पशुधन की पूजा की जाती है। यह दिन विशेष रूप से उन मवेशियों को समर्पित है जो कृषि कार्यों में किसानों की मदद करते हैं। इस दिन किसान अपने पशुओं को स्नान कराते हैं, उनके सींगों पर रंग लगाते हैं, उन्हें फूलों और घंटियों से सजाते हैं और विशेष भोजन खिलाते हैं। यह परंपरा कृषि में पशुओं के महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करती है।

5. पोंगल और मकर संक्रांति में क्या अंतर है?

पोंगल और मकर संक्रांति दोनों एक ही समय पर मनाए जाने वाले पर्व हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हैं। मकर संक्रांति उत्तर भारत में मनाया जाता है जबकि पोंगल दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु का त्योहार है। मकर संक्रांति एक दिन का पर्व है जबकि पोंगल चार दिनों तक चलता है। दोनों ही फसल कटाई के त्योहार हैं और सूर्य के उत्तरायण होने पर मनाए जाते हैं, लेकिन उनकी परंपराएं और रीति-रिवाज अलग-अलग हैं।

 

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